Friday, January 13, 2012
बरस पड़ी लू ...
दंश जो भरा था मैंने,
निर्मम उस नगर में,
छीन कर जीने के लिए.
कुछ न शेष रहा.
कांटे कुम्हलाये ...
बरस पड़ी लू ...
सर्वस्व गया झूम.
जलती उस दुपहरी,
उड़ता दुपट्टा लिए,
चौराहे की भीड़ में,
जब मुझको मिली..
"तुम"
- प्रशांत.
देख न सका उनमें...
पर देख न सका उनमें.
और खुद झुक गया.
सर्वस्व.
सत्-गुण.
सर्व सीमित सुख.
सब कुछ देकर,
जो शेष रहा,
वह थी दो आँखें...
..पर देख न सका उनमें.
और खुद झुक गया.
आखिर...
माँ की जो थी.
- प्रश्. १.१३.२०१२.
कल एक बुत से मिला मैं...
वह मुस्कुरा रहा था...
और मैं,
नज़रें न मिला पा रहा था.
हाथ फेरा सर पे मेरे,
और पलटा, जाने लगा.
"रुको.....", मैं चीखा...
किन्तु वह न रुका.
जाते जाते, एक बयार दे गया.
बस इतनी, कि उसकी खुशबू मात्र शेष रही.
और जान गया मैं... विकल हो रोने लगा:
"माँ ............."
- प्रशांत. १.१३.२०१२.
मर जाता हूँ मैं!
मुस्कुरा देती है बिटिया, और मर जाता हूँ मैं.
- इन्टरनेट के एक अज्ञात शेर से प्रेरित. उन घरों को समर्पित जहाँ बच्चे आज भी इसलिए जल्दी सो जाते हैं कि भूख लग जायेगी.
Tuesday, January 10, 2012
खट्टा.
अपने तो दिमाग का दही हो गया.
ता उम्र दूध दूध चिल्लाता फिरा...
अब खट्टा ही जो भाने लगा,
सब साला सही हो गया!!!
- प्रशांत. १.१०.१२.
Wednesday, January 4, 2012
हक चाहिए उसे...
विवाहित से प्यार का...
समाज से लड़ने का..
कोंस्टेबल से अकड़ने का.
कैसे बताएं बावले को ..
तुझ जैसे को मिलने लगें हक, तो
हर युवा में एक अन्ना जलता..
हर झुग्गी में एक जिम मोर्रिसन पलता...
और हर कसाब के आगे, एक जिंदा भगत सिंह चलता.
एक माँ नहीं पलती.
इस डेनिम जेनरेशन से एक माँ नहीं पलती.
वह नंगा था आधा, पर उत्तम था मानुष..
अब ढकता सब है, मर्यादा नहीं ढकती.
Thursday, August 18, 2011
१२१ करोड में कम स कम १ लाख तो वीर बनाओ?
तब सालों का ज़मीर जागता है?
क्यूँ गाँधी और अन्ना के बगैर सारे बकरियों की तरह इधर उधर भागते हैं?
कब तक कृष्ण और राम के भरोसे देश चलेगा?
पढाओ अपने बच्चों को... जो मिले उन्हें भी बताओ.
१२१ करोड में कम स कम १ लाख तो वीर बनाओ?
- प्रश्. ८/१८/२०११.
हम उनमें खादी अपनी सुखाया करते हैं!
हम उनमें खादी अपनी सुखाया करते हैं!
सत्यमेव जयते!
- प्रशांत. ८/१७/२०११. (इन्टरनेट/ समाचारों से प्रेरित)
Tuesday, July 26, 2011
जिस पल तू इस दिल के पास होती है|
Thursday, July 21, 2011
कुछ अपने से गैर मिले.
- हेमंत शर्मा.
...मैं क्यूँ इतना बदल गया
कितना कुछ पीछे छूट गया, वक़्त हमसे हमको लूट गया,
साँझ ढले जब सांस भर आई, कुछ मुरझाये फूलोँ की खुशबू फिर याद आई,
इस दौड़ में जब भी कदम लडखडाये, वही जाने पहचाने कंधे आगे आये,
साँसे चलती रही मेरी लेकिन मैं जीना भूल गया ,
ये ज़मीं वही थी आसमां वही था जाने मैं क्यू इतना बदल गया ...............
- हेमंत शर्मा.
Tuesday, May 17, 2011
... तो गज़ल होती है!
खैर तो सबसे मिली, मांगे न मांगे, ए वली, (खैर = भीख, वली = औलिया)
तेरे घर से मगर आये, तो गज़ल होती है!
जून की तपती दुपहरी में झुलसते चलते,
कोई शरबत जो दिखाए, तो गज़ल होती है!
बड़ी मुश्किल से हो सोया जो तेरा लख्त-ए-जिगर, (लख्त-ए-जिगर = जिगर का टुकड़ा, बच्चा)
उसे इक छींक जगाए, तो गज़ल होती है!
सुभा हो शाम हो, पढ़ते रहो तुम जंग-ओ-जहद,
परचा विज्ञान का आये, तो गज़ल होती है!
उमर लिहाज औ कपडे, किये खिजाब से गुल, (खिजाब: रंग, मेंह्न्दी)
तब भी वो 'चाचा' बुलाए, तो गज़ल होती है!
एक बस तुम हो, औ वो हों, चले जब 'लिफ्ट' का सफर,
बिना आवाज़ बू आये, तो गज़ल होती है!
- प्राश 'बुडबक्क' ट्राश्.
५/१७/२०११.(Released under GNU Public License. Readers may distribute it, but must share any modifications with the original author.:-)
Thursday, April 14, 2011
अब न कुच्छ मीठा रहा!
दोस्तों के शहर में, गुमशुदा जीता रहा,
हाथ में कुरान -बाइबल, ढूँढता गीता रहा!
इम्तिहान-ए-वक्त से, एक मैं, एक तू थे घायल,
तू अलग पीती रही, मैं अलग पीता रहा!
ऐसे बदले लोग, जंगल, वो गली और रास्ते,
आम चूसे, पान चाबे, अब न कुछ मीठा रहा!
दोस्तों के शहर में, गुमशुदा जीता रहा,
हाथ में कुरान -बाइबल, ढूँढता गीता रहा!
- Prash 'बुडबक' Trash. (प्रशांत)
Tuesday, March 29, 2011
आज, उठ पगले, बस. थोडा सा जी ले.
आधी सी चाय, बाबा का गुस्सा, माँ की फटकार, हँसता हुआ पी ले.
आज, उठ पगले, बस. थोडा सा जी ले.
दूध न आएगा. दफ्तर थम जायेगा. हर इक चौका, चाचा, आँखें भर लाएगा.
दिन दिन के दर्दों को, मुस्का के पी ले.
आज, उठ पगले, बस. थोडा सा जी ले.
कॉलेज बंद सा होगा. हर घर जलसा होगा. पागल से नाचेंगे, कुच्छ ना कल सा होगा.
बीवी को छुट्टी दे, बिटिया को टोफ़ी दे.
आज, उठ पगले, बस. थोडा सा जी ले.
ट्राफिक में घुन घुन के, रिश्वतखोरी सुन के. कुढ़ मत, हंस दे, घर जा.
यह सब कल कर लेना सही रे.
आज, उठ पगले, बस. थोडा सा जी ले.
अल्लाह को, कृष्णा को. आरिफ को, बिसना को.
बल्ला दे, गेंदें दे, जाने दे दलीलें!
आज, उठ पगले, बस. थोडा सा जी ले.
आज, उठ पगले, बस. थोडा सा जी ले.
- Prashant Chopra.
March 29, 2011.