Showing posts with label घर. Show all posts
Showing posts with label घर. Show all posts

Friday, January 13, 2012

मर जाता हूँ मैं!

जब भी बिन आंटे, रोटी के घर जाता हूँ मैं,
मुस्कुरा देती है बिटिया, और मर जाता हूँ मैं.

- इन्टरनेट के एक अज्ञात शेर से प्रेरित. उन घरों को समर्पित जहाँ बच्चे आज भी इसलिए जल्दी सो जाते हैं कि भूख लग जायेगी.