Showing posts with label अज्ञात. Show all posts
Showing posts with label अज्ञात. Show all posts

Saturday, April 24, 2010

मेरे घर भी कभी आओ अल्लाह मियां!

नीले गगन पर बैठे कब तक चाँद सितारों से झांकोगे?
पर्वत की ऊंची चोटी से कब तक दुनिया को देखोगे?
कब तक दुनिया और आदर्शों के ग्रंथों में आराम करोगे?

मेरा छापर टपक रहा है बन कर सूरज इसे सूखाओ.
खली है आटे का कनस्टर, बन कर गेंहू इसमे आओ..
और टूट गया है माँ का चश्मा, बन कर शीशा इसे बनाओ...

गुमसुम है आँगन में बच्चे, बन कर गेंद इन्हे बहलाओ
शाम हुई, चाँद उग आया..हवा चलाओ...हाथ बटाओ अल्लाह मियां....

मेरे घर भी कभी आओ अल्लाह मियां ....!!!!!!!!!!!!!

- अज्ञात.

जाने कितने साल हो गए...

अब तो सुबह शाम रहते हैं
जबड़े कसे हुए
जाने कितने साल हो गए
खुल कर हँसे हुए
हर अच्छे मज़ाक की कोशिश
खाली जाती है
हँसी नाटकों में
पीछे से डाली जाती है

काँटे कुछ दिल से दिमाग़ तक
भीतर धँसे हुए
जाने कितने साल हो गए
खुल कर हँसे हुए

खा डाले खुदगर्ज़ी ने
गहरे याराने भी
आप आप कहते हैं अब तो
दोस्त पुराने भी

मेहमानों से लगते रिश्ते
घर में बसे हुए
जाने कितने साल हो गए
खुल कर हँसे हुए.

- अज्ञात.

राग तेरी बांसुरी का बेसुरा हो जाएगा.

सोचता हूँ जब मेरा बेटा बड़ा हो जाएगा,
तो मेरी बैशाखियाँ, माँ की दवा हो जाएगा.

पेड़ यादों का यूँ ही बढ़ता क्या तो देखना,
इस सफर की धुप में कुछ आसरा हो जाएगा.

न्याये के दरबार मैं मुझको यहीं चिंता रही,
मैं अगर सच कह गया तो जाने क्या हो जाएगा.

सीख लूँगा मैं उसी से जिंदा रहने का हुनर,
जब कभी जिन्दगी से सामना हो जाएगा.

तेरे आने की उम्मीदों से साँस हैं,
गीत के बिन जखम दिल का फिर हरा हो जाएगा.

गोपियों को छोड़ देगा फिर कभी कान्हा तो सुन,
राग तेरी बांसुरी का बेसुरा हो जाएगा.

- अज्ञात.